Jai Sree Ram – May Lord Hanuman bless u with happpiness in ur life…

॥ जय श्रीराम ॥

॥ श्रीहनुमते नमः ॥

जीवन की हर समस्या का समाधान हनुमान चालीसा द्वारा किया जा सकता है। संकट के समय ब्राह्मणों द्वारा हमें हनुमान चलीसा करने की सलाह दी जाती है। हनुमान चालीसा का पाठ करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

हनुमान चालीसा

श्रीहनुमान्-चालीसा पाठ का महत्व 

धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि हनुमानजी ऐसे एक देवता हैं जो कलयुग समय में भी पृथ्वी लोक पर मौजूद हैं और अपने भक्तों के ऊपर आने वाली हर विपदा को दूर करते रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले जीवंत देवता हैं। जीवन की हर समस्या का समाधान हनुमान चालीसा द्वारा किया जा सकता है।

हनुमान चालीसा की अशुद्ध चौपाईयाँ कौन-कौन सी हैं

हर प्रकार के दुखों के निवारण, भय से मुक्ति और अपने आराध्य हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा का नियमित पाठ अवश्य किया जाता है।

जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य ने अवगत कराया है कि हनुमान चालीसा की कुछ चौपाईयों (चौपाई क्रमांक 6, 27, 32 और 38) में अशुद्धियाँ है। यहाँ तक कि गीताप्रेस की हनुमान चालीसा की प्रतियों मे भी यह गलतियाँ छापी गई है।

चौपाई क्रमांक– 6

मूल (चौपाई)-

शंकर सुवन केशरीनन्दन। तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥ ६ ॥

शुद्ध पाठ :-

शंकर स्वयं केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥ ६ ॥

चौपाई क्रमांक– 27  

मूल (चौपाई)-

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥

शुद्ध पाठ :-

सब पर राम राय– सिरताजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥

चौपाई क्रमांक– 32

मूल (चौपाई)-

राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥ 

शुद्ध पाठ :- 

राम रसायन तुम्हरे पासा । सादर हो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥

चौपाई क्रमांक– 38

मूल (चौपाई)-

जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहिं बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥

शुद्ध पाठ :-

यह शत बार पाठ कर जोई। छूटहिं बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले ये जरूर करें

सबसे पहले भगवान सूर्य को प्रणाम करें।
हनुमान जी अपने गुरु भगवान सूर्य की प्रार्थना करने वाले से प्रभावित होते हैं।

फिर सीता और राम जी से प्रार्थना करें।
सीता और राम का जप हमें हनुमान जी के पास लाएगा।

हनुमान चालीसा का शुद्ध (संशोधित) पाठ

जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी ने जो हनुमान चालीसा बताया वह अयोध्या में मिला। अयोध्या जी के हनुमानगढ़ी में वर्ष 1966 से शिलापट्ट पर शुद्ध हनुमान चालीसा लगायी गयी है।

Sankat mochan

दोहा 

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमनु मुकुरु सुधारि। 

बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। 

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। 

बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। 

चौपाई 

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। 

रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। 

महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। 

कंचन वरन विराज सुवेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।। 

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै। 

शंकर स्वयं केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग वन्दन।।  

विद्यावान गुणी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। 

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। 

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।। 

भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। 

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। 

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। 

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। 

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा। नारद सारद सहित अहीसा।। 

जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।। 

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। 

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भये सब जग जाना।। 

जुग सहस्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। 

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। 

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। 

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। 

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।। 

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। 

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। 

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। 

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।। 

सब पर राम राय सिरताजा। तिनके काज सकल तुम साजा। 

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।। 

चारों युग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। 

साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। 

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता।। 

राम रसायन तुम्हरे पासा। सादर हो रघुपति के दासा।। 

तुम्हरे भजन राम को भावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। 

अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।। 

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई।। 

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। 

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। 

यह सत बार पाठ कर जोई। छूटहिं बंदि महा सुख होई।। 

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। 

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।। 

दोहा 

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।  

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।। 

Warm Regards,
Satyam Gupta

☆彡ֆαтуαм🇮🇳 [☆ᏕᎶ ] Avatar

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